कर्म चिंतन
' जो मेरे भाग्य में नहीं है ,
उसे दुनिया की कोई भी शक्ति
मुझे नहीं दे सकती और जो मेरे भाग्य में है
उसे दुनिया की कोई भी शक्ति छीन नहीं सकती ।
ईश्वरीय शक्ति असंभव को सम्भव बना सकती है
परन्तु इसके लिए कर्म करना आवश्यक है ।
अतः ' कर्म ही " कामधेनु " एवं प्रार्थना ही " पारसमणि " है ।
0 Comments